भाषाई तुष्टिकरण बंद करे हेमंत सरकार : प्रिंस सिंह
भाषा विकास का आधार बने, ना कि विवाद का
बंशीधर न्यूज
गढ़वा : झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार द्वारा जेटीइटी परीक्षा की नई नियमावली में भोजपुरी और मगही भाषा को हटाना न केवल दुर्भाग्यपूर्ण, बल्कि राज्य के साथ घोर विश्वासघात है। यह फैसला भाषाई विभाजन की आग भड़काने का खतरनाक षड्यंत्र है, जो झारखंड को आंतरिक कलह और सामाजिक फूट की चपेट में झोंक देगा। उक्त बातें अभाविप के प्रदेश कार्यसमिति सदस्य प्रिंस कुमार सिंह ने कही।
उन्होंने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुये कहा कि पलामू प्रमंडल सहित उत्तरी झारखंड के लाखों निवासी भोजपुरी-मगही को अपनी मातृभाषा मानते हैं। इन भाषाओं का उपयोग दैनिक जीवन, संस्कृति और शिक्षा में गहराई से जुड़ा है। फिर भी सरकार इस निरंकुश निर्णय से स्पष्ट संदेश दे रही है कि पलामू के लोग राज्य के अभिन्न अंग नहीं है। यह केवल भाषाई मुद्दा नहीं, बल्कि क्षेत्रीय विद्यार्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है।
भोजपुरी-मगही बोलने वाले लाखों छात्र जेटीइटी परीक्षा से वंचित हो जाएंगे, जो उनकी योग्यता को कुचल देगा। श्री सिंह ने कहा कि सरकार क्षेत्र विशेष के साथ सौतेला व्यवहार कर रही है, जो संविधान की भावना का उल्लंघन है। झारखंड राज्य गठन के समय ही भाषाई विविधता को मजबूती देने का वादा किया गया था, लेकिन आज वही सरकार एक भाषा थोप रही है।
हेमंत सरकार की यह रणनीति साफ है कि अपनी नाकामियों को ढंकने के लिये युवाओं को भड़काओ, द्वंद्व फैलाओ। बेरोजगारी, शिक्षा संकट और विकास की कमी छिपाने के लिये भाषा का हथियार उठा लिया। झारखंड के युवा अब जाग चुके हैं यह तुष्टिकरण का खेल राज्य का विद्यार्थी कतई स्वीकार नही करेगा।
प्रिंस ने कहा कि भाषा के आधार पर युवाओं में विभाजन की साजिश अत्यंत निंदनीय और असहनीय है। अभाविप झारखंड के सभी विद्यार्थीयों को समान रूप से मानती हैं। क्षेत्र, भाषा, जाति या लिंग के नाम पर कोई भेदभाव बर्दाश्त नहीं होगा।
हम भाषाई समानता और सम्मान के लिये लड़ेंगे और सरकार से भी मांग करते है कि जेटीइटी की नई नियमावली में भोजपुरी और मगही भाषा को तुरंत शामिल किया जाय एवं राज्य स्तर पर भाषाई नीति में सभी स्थानीय भाषाओं को मान्यता दिया जाना चाहिये।
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